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Archive for अगस्त, 2008

प्रतीक्षा…

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता ?

मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आने वाले,
पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले,
साँसें घूमघूम फिरफिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं,
मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता?

उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले,
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपने होश सम्हाले,
तारों की महफिल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से,
मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता?

बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती,
रगरग में चेतनता घुलकर, आँसू के कणसी झर जाती,
नमक डलीसा गल अपनापन, सागर में घुलमिलसा जाता,
अपनी बाँहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता?

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मंज़िलों की खोज में तुमको जो चलता सा लगा,
मुझको तो वो ज़िन्दगी भर घर बदलता सा लगा,
धूप आयी तो हवा का दम निकलता सा लगा,
और सूरज भी हवा को देख जलता सा लगा,
झूठ जबसे चाँदनी बन भीड़ को भरमा गया,
सच का सूरज झूठ के पाँवों पे चलता सा लगा,
मेरे ख्वाबों पर ज़मीनी सच की बिजली जब गिरी,
आसमानी बर्क क़ा भी दिल दहलता सा लगा,
चन्द क़तरे ठन्डे क़ागज़ के बदन को तब दिए,
खून जब अपनी रगों में कुछ उबलता सा लगा ॥

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हम कैसे पागल होते थे…..
एक फूल को चुनने की खातिर, कांटों से ज़ख्मी होते थे,
जो फूल झोली मैं आ गिरता, उसे छूने से डर जाते थे।
हम कैसे पागल होते थे…..
के धुंधले आइनों मैं अपना, हम अक्स सा ढूँढा करते थे,
और किरचियाँ चटकते आइनों की, मुठ्ठी मैं दबा कर रखते थे,
हम कैसे पागल होते थे….
जब सड़क पर चलना होता था, हम कश्ती ले कर चलते थे,
और बीच भंवर में जाने को, हम पैदल निकला करते थे,
हम कैसे पागल होते थे….
जब बारिश बरसा करती थी, हम छतरी में छुप जाते थे,
और जलती धुप में नंगे सर, हम छत पर उछला करते थे,
हम कैसे पागल होते थे….
जब पास बहुत वो होता था, हम उस को देख न सकते थे,
जब दूर चला जाता था वो, हम आहट उस की सुनते थे,
हम कैसे पागल होते थे….
जब सारी दुनिया सोती थी, हम चाँद से खेला करते थे,
जब सारी दुनिया जाग उठी, हम फिर थक कर सो जाते थे,
हम कितने पागल होते थे….
हम आज भी वैसे चंचल है…. ….. हम जैसे पागल होते थे….

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आंसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा,
जहाँ प्रेम की चर्चा होगी, मेरा नाम लिया जाएगा।

मान पत्र मैं नहीं लिख सका, राजभवन के सम्मानों का,
मैं तो आशिक रहा जन्म से, सुन्दरता के दीवानों का।
लेकिन था मालुम नहीं ये, केवल इस गलती के कारण,
सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा॥

खिलने को तैयार नहीं थी, तुलसी भी जिनके आँगन में,
मैंने भर–भर दिए सितारे, उनके मटमैले दामन में।
पीड़ा के संग रास रचाया, आँख भरी तो झूम के गाया,
जैसे मैं जी लिया किसी से, क्या इस तरह जिया जाएगा॥

काजल और कटाक्षों पर तो, रीझ रही थी दुनिया सारी,
किंतु मैंने बरसने वाली, आँखों की आरत्ती उतारी।
रंग उड़ गए सब सतरंगी, तार हर साँस हो गई,
फटा हुआ यह कुर्ता अब तो, ज्यादा नहीं सिया जाएगा॥

जब भी कोई सपना टूटा, मेरी आंख वहां बरसी है,
तड़पा हूँ मैं जब भी कोई, मछली पानी को तरसी है।
गीत दर्द का पहला बेटा, दुःख है उसका खेल खिलौना,
कविता तब मीरा होगी, जब हंसकर जहर पिया जाएगा ॥

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कभी मिलना कभी खोना, कभी पास पास चलना।
ये है जिंदगी का मेला, तुम साथ साथ हो ना॥

कहीं भीड़ है घनेरी, कहीं राह है अँधेरी,
कहीं रौशनी की खुशियाँ, कहीं मछलियाँ सुनहरी॥
कभी सीढियों पे चढ़ना, कभी ढाल पर फिसलना।
ये है जिंदगी का मेला, तुम साथ साथ हो ना॥

कभी चर्खियों के चक्कर, कहीं शोर यातना सा।
कुछ फिकरे और धक्के, कुछ मुफ्त बाँटना सा॥
रंगीन बुलबुलों सा, कभी आसमाँ में उड़ना।
ये है जिंदगी का मेला, तुम साथ साथ हो ना॥

कहीं मौत का है कुँआ, कहीं मसखरों का जादू।
कभी ढेर भर गुब्बारे, कहीं मोंगरे की खुशबु ॥
कभी जिंदगी को सिलना, कभी दर्द को पिरोना।
ये है जिंदगी का मेला, तुम साथ साथ हो ना॥

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” थी ज़िन्दगी कुछ हमसे खफा, जो सपने सब बह चले ,पल में…”
” कौन सुनता इस दिल की सदा, कौन सुनता धर्कानों का बयान… “
” आवाज़ दिल तक पहुँचती नहीं, लौट के फिर ज़िन्दगी, आती नहीं…”
” मौत ही, अब महबूबा मेरी, मौत ही अब, हमसाया मेरा…”
” ख्यालों में हमें ख्याल आया, मोहब्बत में हमने,
क्या खोया-क्या पाया….. ज़िन्दगी तो बन गयी थी ज़हर,
आज मौत का मज़ा समझ पाया… “
” समझ लिया अब तुने ‘सागर’, प्यार का सागर गहरा कितना…
डूबा इसमे हर आशिक उतना जो समझा मोहब्बत जितना…”

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अपनी तो दुनिया ही दोस्तों से है…..
खुशी भी दोस्तों से है, गम भी दोस्तों से है,
तकरार भी दोस्तों से है, प्यार भी दोस्तों से है,
रूठना भी दोस्तों से है, मानना भी दोस्तों से है,
बात भी दोस्तों से है, मिसाल भी दोस्तों से है,
नशा भी दोस्तों से है, शाम भी दोस्तों से है,
जिंदगी की शुरुवात भी दोस्तों से है,
जिंदगी में मुलाकात भी दोस्तों से है,
मोहब्बत भी दोस्तों से है, इनायत भी दोस्तों से है,
काम भी दोस्तों से है, नाम भी दोस्तों से है,
ख्याल भी दोस्तों से है, अरमान भी दोस्तों से है,
ख्वाब भी दोस्तों से है, माहोल भी दोस्तों से है,
यादें भी दोस्तों से है, मुलाकातें भी दोस्तों से है,
सपने भी दोस्तों से हैं, अपने भी दोस्तों से है,
या यूँ कहूँ यारो। अपनी तो दुनिया ही दोस्तों से है…..

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