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Archive for the ‘Uncategorized’ Category

हमने भी ज़माने के कई रंग देखे है,
कभी धूप, कभी छाव, कभी बारिशों के संग देखे है।

जैसे जैसे मौसम बदला लोगों के बदलते रंग देखे है,

ये उन दिनों की बात है जब हम मायूस हो जाया करते थे,
और अपनी मायूसियत का गीत लोगों को सुनाया करते थे।

और कभी कभार तो ज़ज्बात मैं आकर आँसू भी बहाया करते थे,
और लोग अक्सर हमारे आसुओं को देखकर हमारी हँसी उड़ाया करते थे।

“अचानक ज़िन्दगी ने एक नया मोड़ लिया,
और हमने अपनी परेशानियों को बताना ही छोड़ दिया” ।

अब तो दूसरों की जिंदगी मैं भी उम्मीद का बीज बो देते है,
और खुद को कभी अगर रोना भी पड़े तो हँसते-हँसते रो देते है॥

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हमने भी ज़माने के कई रंग देखे है,
कभी धूप, कभी छाव, कभी बारिशों के संग देखे है।

जैसे जैसे मौसम बदला लोगों के बदलते रंग देखे है,

ये उन दिनों की बात है जब हम मायूस हो जाया करते थे,
और अपनी मायूसियत का गीत लोगों को सुनाया करते थे।

और कभी कभार तो ज़ज्बात मैं आकर आँसू भी बहाया करते थे,
और लोग अक्सर हमारे आसुओं को देखकर हमारी हँसी उड़ाया करते थे।

“अचानक ज़िन्दगी ने एक नया मोड़ लिया,
और हमने अपनी परेशानियों को बताना ही छोड़ दिया” ।

अब तो दूसरों की जिंदगी मैं भी उम्मीद का बीज बो देते है,
और खुद को कभी अगर रोना भी पड़े तो हँसते-हँसते रो देते है॥

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हम वो गुलाब है

हम वो गुलाब है जो टूट कर भी मुस्कान छोड़ जाते हैं,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं।

दुनिया के प्रेम प्रसंगो में हम गुलाबों को टूटना हीं पड़ता है,
और हमे देने वाले हर प्रेमी को झुकना हीं पड़ता है,
कभी हमे फरमाइश कभी नुमाइश बना दिया,
जी चाहा ज़ुल्फों में लगाया,जी चाहा सेज़ पे सज़ा दिया
मेरे तन को छेड़ कर , दीवाने कैसे मचल जाते हैं,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं।

बात अभी इतनी होती तो क्या बात थी,
पर अभी और भी काली होने वाली रात थी,
मेरे अरमानों को कुचल कर इत्र बना दिया,
और दिखावटी शिशियों में भर कर सजा दिया,
हम मर कर भी साँसों में महक छोड़ जाते है,
दुसरों के रिश्ते बनाते फिरते हैं और खुद तन्हा रह जाते हैं।

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प्रतीक्षा…

मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता ?

मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,
कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?

तुमने कब दी बात रात के सूने में तुम आने वाले,
पर ऐसे ही वक्त प्राण मन, मेरे हो उठते मतवाले,
साँसें घूमघूम फिरफिर से, असमंजस के क्षण गिनती हैं,
मिलने की घड़ियाँ तुम निश्चित, यदि कर जाते तब क्या होता?

उत्सुकता की अकुलाहट में, मैंने पलक पाँवड़े डाले,
अम्बर तो मशहूर कि सब दिन, रहता अपने होश सम्हाले,
तारों की महफिल ने अपनी आँख बिछा दी किस आशा से,
मेरे मौन कुटी को आते तुम दिख जाते तब क्या होता?

बैठ कल्पना करता हूँ, पगचाप तुम्हारी मग से आती,
रगरग में चेतनता घुलकर, आँसू के कणसी झर जाती,
नमक डलीसा गल अपनापन, सागर में घुलमिलसा जाता,
अपनी बाँहों में भरकर प्रिय, कण्ठ लगाते तब क्या होता?

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मंज़िलों की खोज में तुमको जो चलता सा लगा,
मुझको तो वो ज़िन्दगी भर घर बदलता सा लगा,
धूप आयी तो हवा का दम निकलता सा लगा,
और सूरज भी हवा को देख जलता सा लगा,
झूठ जबसे चाँदनी बन भीड़ को भरमा गया,
सच का सूरज झूठ के पाँवों पे चलता सा लगा,
मेरे ख्वाबों पर ज़मीनी सच की बिजली जब गिरी,
आसमानी बर्क क़ा भी दिल दहलता सा लगा,
चन्द क़तरे ठन्डे क़ागज़ के बदन को तब दिए,
खून जब अपनी रगों में कुछ उबलता सा लगा ॥

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हम कैसे पागल होते थे…..
एक फूल को चुनने की खातिर, कांटों से ज़ख्मी होते थे,
जो फूल झोली मैं आ गिरता, उसे छूने से डर जाते थे।
हम कैसे पागल होते थे…..
के धुंधले आइनों मैं अपना, हम अक्स सा ढूँढा करते थे,
और किरचियाँ चटकते आइनों की, मुठ्ठी मैं दबा कर रखते थे,
हम कैसे पागल होते थे….
जब सड़क पर चलना होता था, हम कश्ती ले कर चलते थे,
और बीच भंवर में जाने को, हम पैदल निकला करते थे,
हम कैसे पागल होते थे….
जब बारिश बरसा करती थी, हम छतरी में छुप जाते थे,
और जलती धुप में नंगे सर, हम छत पर उछला करते थे,
हम कैसे पागल होते थे….
जब पास बहुत वो होता था, हम उस को देख न सकते थे,
जब दूर चला जाता था वो, हम आहट उस की सुनते थे,
हम कैसे पागल होते थे….
जब सारी दुनिया सोती थी, हम चाँद से खेला करते थे,
जब सारी दुनिया जाग उठी, हम फिर थक कर सो जाते थे,
हम कितने पागल होते थे….
हम आज भी वैसे चंचल है…. ….. हम जैसे पागल होते थे….

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आंसू जब सम्मानित होंगे, मुझको याद किया जाएगा,
जहाँ प्रेम की चर्चा होगी, मेरा नाम लिया जाएगा।

मान पत्र मैं नहीं लिख सका, राजभवन के सम्मानों का,
मैं तो आशिक रहा जन्म से, सुन्दरता के दीवानों का।
लेकिन था मालुम नहीं ये, केवल इस गलती के कारण,
सारी उम्र भटकने वाला, मुझको शाप दिया जाएगा॥

खिलने को तैयार नहीं थी, तुलसी भी जिनके आँगन में,
मैंने भर–भर दिए सितारे, उनके मटमैले दामन में।
पीड़ा के संग रास रचाया, आँख भरी तो झूम के गाया,
जैसे मैं जी लिया किसी से, क्या इस तरह जिया जाएगा॥

काजल और कटाक्षों पर तो, रीझ रही थी दुनिया सारी,
किंतु मैंने बरसने वाली, आँखों की आरत्ती उतारी।
रंग उड़ गए सब सतरंगी, तार हर साँस हो गई,
फटा हुआ यह कुर्ता अब तो, ज्यादा नहीं सिया जाएगा॥

जब भी कोई सपना टूटा, मेरी आंख वहां बरसी है,
तड़पा हूँ मैं जब भी कोई, मछली पानी को तरसी है।
गीत दर्द का पहला बेटा, दुःख है उसका खेल खिलौना,
कविता तब मीरा होगी, जब हंसकर जहर पिया जाएगा ॥

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