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तुम साथ साथ हो ना…..

कभी मिलना कभी खोना, कभी पास पास चलना।
ये है जिंदगी का मेला, तुम साथ साथ हो ना॥

कहीं भीड़ है घनेरी, कहीं राह है अँधेरी,
कहीं रौशनी की खुशियाँ, कहीं मछलियाँ सुनहरी॥
कभी सीढियों पे चढ़ना, कभी ढाल पर फिसलना।
ये है जिंदगी का मेला, तुम साथ साथ हो ना॥

कभी चर्खियों के चक्कर, कहीं शोर यातना सा।
कुछ फिकरे और धक्के, कुछ मुफ्त बाँटना सा॥
रंगीन बुलबुलों सा, कभी आसमाँ में उड़ना।
ये है जिंदगी का मेला, तुम साथ साथ हो ना॥

कहीं मौत का है कुँआ, कहीं मसखरों का जादू।
कभी ढेर भर गुब्बारे, कहीं मोंगरे की खुशबु ॥
कभी जिंदगी को सिलना, कभी दर्द को पिरोना।
ये है जिंदगी का मेला, तुम साथ साथ हो ना॥

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कोई शिकवा नहीं………

” थी ज़िन्दगी कुछ हमसे खफा, जो सपने सब बह चले ,पल में…”
” कौन सुनता इस दिल की सदा, कौन सुनता धर्कानों का बयान… “
” आवाज़ दिल तक पहुँचती नहीं, लौट के फिर ज़िन्दगी, आती नहीं…”
” मौत ही, अब महबूबा मेरी, मौत ही अब, हमसाया मेरा…”
” ख्यालों में हमें ख्याल आया, मोहब्बत में हमने,
क्या खोया-क्या पाया….. ज़िन्दगी तो बन गयी थी ज़हर,
आज मौत का मज़ा समझ पाया… “
” समझ लिया अब तुने ‘सागर’, प्यार का सागर गहरा कितना…
डूबा इसमे हर आशिक उतना जो समझा मोहब्बत जितना…”

अपनी तो दुनिया ही दोस्तों से है…..
खुशी भी दोस्तों से है, गम भी दोस्तों से है,
तकरार भी दोस्तों से है, प्यार भी दोस्तों से है,
रूठना भी दोस्तों से है, मानना भी दोस्तों से है,
बात भी दोस्तों से है, मिसाल भी दोस्तों से है,
नशा भी दोस्तों से है, शाम भी दोस्तों से है,
जिंदगी की शुरुवात भी दोस्तों से है,
जिंदगी में मुलाकात भी दोस्तों से है,
मोहब्बत भी दोस्तों से है, इनायत भी दोस्तों से है,
काम भी दोस्तों से है, नाम भी दोस्तों से है,
ख्याल भी दोस्तों से है, अरमान भी दोस्तों से है,
ख्वाब भी दोस्तों से है, माहोल भी दोस्तों से है,
यादें भी दोस्तों से है, मुलाकातें भी दोस्तों से है,
सपने भी दोस्तों से हैं, अपने भी दोस्तों से है,
या यूँ कहूँ यारो। अपनी तो दुनिया ही दोस्तों से है…..

वो कैसी शख्स है कि हर रोज़ सज़ा देती है,
फ़िर हंसती है वो इतना कि सब भुला देती है।

कभी जो रो दे तो मुझ को भी भूल जाती है,
और फ़िर भूल के मुझको भी रुला देती है।
हमारे पास ना आने की कसम खा कर वो,
नाम लिखती है वो, कागज़ पे उड़ा देती है।

उस से पूछो के बता किस से मुहब्बत है तुम्हे,
नाम सरगोशी में मेरा ही सुना देती है।
कभी कहती है चलो साथ हमेशा मेरे,
चल पड़ू साथ तो रास्ता ही फिरा देती है।

ख़ुद ही कहती है न दोहराओ पुरानी यादें,
मैं न दोहराऊ तो फिर ख़ुद ही सुना देती है।
ख़ुद ही लिखती है के जज़्बात में हलचल ना करो,
और फिर ख़ुद ही नई आग लगा देती है…!

वो कैसी शख्स है कि हर रोज़ सज़ा देती है,

तेली का ब्याह

भोलू तेली गाँव में, करे तेल की सेल,
गली गली फेरी करे, “तेल लेऊ जी तेल”,
तेल लेऊ जी तेल, कङकङी ऐसी बोली,
बिजुरी तड़के अथवा छुट रही हो गोली,
कहं काका कवि कछुक दिना सन्नाटो छायो,
एक साल तक तेली नही ग्राम में आयो।

मिल्यो अचानक एक दिन, मरियल वाकी चाल,
काया ढीली पिलपिली, पिचके दोउ गाल,
पिचके दोउ गाल, गैल में धक्का खावे’,
तेल लेऊ जी तेल, बकरिया सा मिमियावे,
पूछी हमने यह क्या हाल है गयो तेरो,
तेली बोला काका ब्याह है गयो मेरो॥

गजल

उँगलियाँ थाम के खुद चलना सिखाया था,
जिसे राह में छोड़ गया राह पे लाया था जिसे।
उसने पोंछे ही नहीं अश्क मेरी आँखों से,
मैंने खुद रोके बहुत देर हँसाया था जिसे।
बस उसी दिन से खफा है वो मेरा इक चेहरा,
धुप में आइना इक रोज दिखाया था जिसे।
छू के होंठों को मेरे वो भी कहीं दूर गई,
इक गजल शौक से मैंने कभी गाया था जिसे।
दे गया घाव वो ऐसे कि जो भरते ही नहीं,
अपने सीने से कभी मैंने लगाया था जिसे।
होश आया तो हुआ यह कि मेरा इक दुश्मन,
याद फिर आने लगा मैंने भुलाया था।
जिसे वो बड़ा क्या हुआ सर पर ही चढ़ा जाता,
है मैंने काँधे पे `कुँअर’ हँस के बिठाया था जिसे

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर,
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था ?
‘यह अधिकार कहाँ से लाया!’
और न कुछ मैं कहने पाया –
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था ?

वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में –
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?